कल्पना की मौत से खुला रीवा का बड़ा स्कैम : अधिकारियों की शह से 10 हजार में बिका अमानक प्लेटलेट्स: चढ़ते ही छूटी मरीज की सांसें, रीवा में फर्जी ब्लड बैंक ने ली महिला की जान

 
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ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के विंध्य अंचल की राजधानी कहे जाने वाले रीवा शहर से स्वास्थ्य महकमे को हिला देने वाला एक अत्यंत खौफनाक मामला सामने आया है। जिंदगी बचाने का दावा करने वाले ब्लड बैंक अब पैसों के लालच में मौत का सौदा बांट रहे हैं। शहर के विवादित अथर्वन ब्लड बैंक (Atharvan Blood Bank) द्वारा बेचे गए कथित दूषित अथवा अमानक प्लेटलेट्स के चढ़ने से कल्पना मिश्रा नाम की एक महिला मरीज की दर्दनाक मौत हो गई।

चौंकाने वाली बात यह है कि जिस संस्थान से परिजनों ने ऊंचे दामों में खून का यह घटक खरीदा, उसका सरकारी लाइसेंस पहले से ही निलंबित (Suspended) चल रहा था। इसके बावजूद, शहर के बीचों-बीच यह केंद्र बेधड़क फल-फूल रहा था। इस पूरे प्रकरण ने न केवल स्थानीय जिला प्रशासन की मुस्तैदी की पोल खोल दी है, बल्कि राज्य के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला के गृह जिले में स्वास्थ्य तंत्र के खोखलेपन को उजागर कर दिया है।

क्या है पूरा मामला? 26 अगस्त को जीएमएच में बिगड़ी थी मरीज की सांसें
घटनाक्रम की शुरुआत अगस्त माह के अंत में हुई जब गंभीर रूप से बीमार कल्पना मिश्रा को उपचार के लिए रीवा के सरकारी अस्पताल (GMH/SGMH) में दाखिल कराया गया। चिकित्सकीय जांच के दौरान मरीज का हीमोग्लोबिन स्तर 12 प्रतिशत पाया गया, किंतु उसके शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से घटकर महज 30,000 के आसपास पहुंच गई थी।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों ने परिजनों को तत्काल प्लेटलेट्स का प्रबंध करने का निर्देश दिया। परिजनों ने सबसे पहले सरकारी अस्पताल और संबद्ध ब्लड बैंक में संपर्क साधा, किंतु समय पर वहां से प्लेटलेट्स की उपलब्धता न हो सकी। मरीज की लगातार गिरती हालत से घबराए परिजन भागते-भागते शहर के अथर्वन ब्लड बैंक पहुंचे। वहां कर्मचारियों ने बिना किसी हिचकिचाहट के प्लेटलेट्स उपलब्ध कराने के एवज में भारी-भरकम राशि की मांग रख दी।

बिना रसीद नगद में बिका खून: अथर्वन ब्लड बैंक का खतरनाक खेल
अथर्वन ब्लड बैंक में मौजूद कर्मचारियों ने चार यूनिट प्लेटलेट्स के बदले 10,000 रुपये की मांग की। कल्पना की बहन जब मौके पर पहुंची, तो उसने डिजिटल पेमेंट या ऑनलाइन ट्रांसफर के जरिए भुगतान करने की बात कही। लेकिन ब्लड बैंक के कर्मियों ने साफ शब्दों में ऑनलाइन भुगतान लेने से मना कर दिया और केवल नगद (Cash) राशि लाने की शर्त रख दी।

  • पक्की रसीद देने से साफ इनकार: चूंकि संस्थान का लाइसेंस शासन स्तर से सस्पेंड चल रहा था, इसलिए ब्लैक मनी और अवैध बिक्री को छुपाने के लिए पक्की रसीद देने की कोई व्यवस्था नहीं रखी गई थी।
  • पेट्रोल पंप से नगद का इंतजाम: लाचार परिजनों ने मरीज की जान बचाने की खातिर पास के एक पेट्रोल पंप पर जाकर ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर कर नगद कैश निकाला और फिर ब्लड बैंक को भुगतान किया।
  • अवैध रसीद-रहित सौदा: भुगतान होते ही बिना किसी बिल या आधिकारिक मोहर के एक यूनिट प्लेटलेट्स परिजनों के सुपुर्द कर दिया गया।

रिएक्शन करते ही चढ़ना बंद हुआ प्लेटलेट्स, फिर भी नहीं बच सकी जान
26 अगस्त की शाम लगभग 4:30 बजे अस्पताल के वार्ड में भर्ती कल्पना मिश्रा को अथर्वन ब्लड बैंक से लाया गया प्लेटलेट्स चढ़ाना शुरू किया गया। लेकिन अभी आधी बोतल खून भी शरीर में नहीं पहुंचा था कि मरीज की स्थिति अचानक बिगड़ने लगी।

  • ब्लड प्रेशर में अप्रत्याशित उछाल: मरीज का रक्तचाप अचानक खतरनाक स्तर तक बढ़ गया और उसे गभीर घबराहट के साथ सांस लेने में तकलीफ होने लगी।
  • प्लेटलेट्स का रिएक्शन: डॉक्टरों ने स्थिति भांपते हुए तुरंत ड्रिप को बंद कर दिया। प्राथमिक आकलन में यह बात साफ हो गई कि चढ़ाए जा रहे प्लेटलेट्स में भारी तकनीकी या जैविक गड़बड़ी थी, जिसने शरीर के अंदर जाते ही तीव्र 'रिएक्शन' कर दिया था।
  • 26 अगस्त को तोड़ दिया दम: अमानक या संक्रमित प्लेटलेट्स का जहर शरीर में फैलने के कारण मरीज की स्थिति में सुधार नहीं हो सका और उसी दिन (26 अगस्त) इलाज के दौरान कल्पना मिश्रा की सांसे थम गईं।

जांच टीम के सामने सहमे ड्रग इंस्पेक्टर: रिपोर्ट पर खड़े हुए सवाल
कल्पना मिश्रा की मौत और सस्पेंडेड ब्लड बैंक के खुलेआम संचालन की खबर जैसे ही भोपाल और जबलपुर तक पहुंची, राज्य स्वास्थ्य विभाग की उच्चस्तरीय जांच टीम रीवा पहुंची। टीम ने श्याम शाह मेडिकल कॉलेज परिसर में जिला औषधि निरीक्षक (Drug Inspector) राधेश्याम वट्टी को तलब किया। 
जब जांच टीम के अधिकारियों ने ड्रग इंस्पेक्टर से अथर्वन ब्लड बैंक की वर्तमान कानूनी स्थिति का ब्योरा मांगा, तो वे संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए। सूत्रों के अनुसार, शुरुआत में गोलमोल जवाब देने पर जांच दल ने औषधि निरीक्षक को जमकर फटकार लगाई।

अधिकारियों के कड़े तेवरों के बाद ड्रग इंस्पेक्टर को यह स्वीकार करना पड़ा कि अथर्वन ब्लड बैंक का लाइसेंस वर्तमान में निलंबित (Suspended) है। इसके बाद जांच टीम ने उनसे पूछा कि यदि लाइसेंस निलंबित था, तो शहर में खून की अवैध बिक्री किसके संरक्षण में जारी थी? टीम ने पुरानी आधी-अधूरी रिपोर्ट को खारिज करते हुए ड्रग इंस्पेक्टर को नए सिरे से तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार कर प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला के गृह जिले में सुस्त पड़ा सिस्टम
इस पूरे घटनाक्रम ने मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला के प्रशासनिक नियंत्रण पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। रीवा उनका गृह क्षेत्र है; यहीं संभागायुक्त (कमिश्नर), आईजी, कलेक्टर और स्वास्थ्य विभाग के क्षेत्रीय संचालक (AD) का कार्यालय स्थित है।

इसके बावजूद, प्रशासनिक नाक के ठीक नीचे एक निलंबित संस्था खुलेआम जीवन रक्षक रक्त घटकों का सौदा कर रही थी। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जब जिले के शीर्ष जनप्रतिनिधि ही प्रदेश का स्वास्थ्य महकमा संभाल रहे हों, तब उनके अपने क्षेत्र में इस प्रकार का जानलेवा कालाबाजारी नेटवर्क चलना सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही और उदासीनता को दर्शाता है।

क्या रीवा में भी दोहराया जा रहा सतना का एड्स कांड?
कुछ समय पूर्व पड़ोसी जिले सतना के जिला अस्पताल में निजी ब्लड बैंकों की लापरवाही के चलते मासूम बच्चों को दूषित खून चढ़ाने और उन्हें एचआईवी (एड्स) व हेपेटाइटिस जैसी असाध्य बीमारियों से संक्रमित करने का सनसनीखेज मामला सामने आया था। उस जांच के तार भी रीवा की अवैध सप्लाई चेन से जुड़े होने की बात सामने आई थी।

रीवा में जिस प्रकार से बिना जांचे-परखे और निलंबित प्रयोगशालाओं से खून और प्लेटलेट्स की सप्लाई की जा रही है, उससे इस बात की प्रबल आशंका जताई जा रही है कि विंध्य अंचल के सैकड़ों मरीज गंभीर संक्रमणों की गिरफ्त में आ सकते हैं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की शह के बिना इतना बड़ा अवैध सिंडिकेट चलना असंभव प्रतीत होता है।

अवैध ब्लड बैंकों पर कानूनी शिकंजा और मरीज के अधिकार
ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट (Drugs and Cosmetics Act, 1940) तथा नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल (NBTC) के नियमानुसार:

  • बिना लाइसेंस बिक्री गैर-जमानती अपराध: निलंबित या बिना लाइसेंस वाले ब्लड बैंक द्वारा रक्त का क्रय-विक्रय करना पूरी तरह से संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आता है।
  • IPC / BNS की धाराएं: अमानक रक्त चढ़ाकर मरीज की जान लेने के मामले में संबंधित लैब संचालक और जिम्मेदार अधिकारियों पर गैर-इरादतन हत्या (BNS Section 105 / IPC 304) का मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
  • पक्की रसीद व टेस्टिंग अनिवार्य: प्रत्येक ब्लड बैंक के लिए एनएबीएच (NABH) और सरकारी मानकों के अनुसार प्रत्येक यूनिट की 7 मुख्य बीमारियों (HIV, Hepatitis B, C, Malaria, Syphilis आदि) की जांच रिपोर्ट के साथ आधिकारिक बिल देना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

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