कलेक्टर का आदेश रद्दी की टोकरी में! रीवा के दो डॉक्टरों ने बहती गंगा में धोए हाथ, जो दवाइयां स्टोर में भरी थीं, उसी का दोबारा बिल बनाकर किया 35 लाख का गबन

 
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रीवा स्वास्थ्य विभाग में 35 लाख का दवा खरीदी घोटाला; कलेक्टर के आदेश को ताक पर रखकर दो सीएमएचओ डॉ. अनुराग और डॉ. यत्नेश ने मिलकर ठिकाने लगाया बजट।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा जिले से सरकारी बजट को ठिकाने लगाने का एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर मामला सामने आया है। यहाँ के स्वास्थ्य विभाग (Health Department Rewa) में 'लोकल पर्चेज' (Local Purchase) यानी स्थानीय स्तर पर सामग्रियों की खरीदी के नाम पर करीब 35 लाख रुपये का बड़ा घोटाला (Medicine Scam) किया गया है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी यानी कलेक्टर ने इस टेंडर प्रक्रिया पर स्पष्ट रूप से रोक लगा दी थी, लेकिन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने अपने निजी फायदे के लिए कलेक्टर के आदेश को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया।

इस पूरे फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है। जांच टीम ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं (Joint Director Health Services) और कमिश्नर को सौंप दी है। इस घोटाले में किसी एक प्रशासनिक मुखिया की नहीं, बल्कि एक के बाद एक पद पर बैठे दो तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों (CMHO) की सीधी संलिप्तता पाई गई है।

क्या है रीवा दवा खरीदी घोटाला और इसमें दो सीएमएचओ कैसे फंसे?
इस पूरे घोटाले की पटकथा साल 2026 के शुरुआती महीनों में लिखी गई। स्वास्थ्य विभाग के पास मार्च के अंत तक बजट को खपाने का दबाव या यूँ कहें कि लालच था। विभाग ने योजनाबद्ध तरीके से उन दवाइयों की लोकल खरीदी करने की फाइल तैयार की, जो दवाइयां पहले से ही रीवा के मुख्य स्वास्थ्य स्टोर में भारी मात्रा में मौजूद थीं। यानी जिन दवाइयों की अस्पतालों में कोई कमी नहीं थी, उन्हें दोबारा सिर्फ इसलिए खरीदा गया ताकि सरकारी खजाने से 35 लाख 47 हजार 205 रुपये की राशि का आहरण कर आपस में बंदरबांट की जा सके।

इस घोटाले के कालखंड में रीवा के सीएमएचओ पद को लेकर कानूनी रस्साकशी चल रही थी। कोर्ट केस के कारण डॉ. यत्नेश त्रिपाठी कुछ समय के लिए इस पद से हट गए थे और उनकी जगह डॉ. अनुराग शर्मा को प्रभारी सीएमएचओ का दायित्व सौंपा गया था। जांच रिपोर्ट के अनुसार, टेंडर की शुरुआत करने वाले डॉ. अनुराग शर्मा थे, जबकि इस अवैध टेंडर को अंतिम रूप देकर भुगतान पास करने वाले डॉ. यत्नेश त्रिपाठी निकले। यही वजह है कि इस घोटाले में एक नहीं, बल्कि दो-दो सीएमएचओ पूरी तरह से फंस चुके हैं।

कलेक्टर के आदेश की अवहेलना: डॉ. अनुराग शर्मा ने कैसे जारी किया टेंडर?
घोटाले की शुरुआत जनवरी 2026 में हुई। प्रभारी सीएमएचओ डॉ. अनुराग शर्मा के कार्यकाल के दौरान क्रय समिति (Purchase Committee) ने दवाइयों की स्थानीय स्तर पर खरीदी के लिए एक फाइल (नोटसीट क्रमांक 25/13 जनवरी 2026, पृष्ठ क्रमांक 1 और 2) तैयार की। इस फाइल को 20 फरवरी 2026 को अंतिम मंजूरी और अनुमोदन के लिए तत्कालीन कलेक्टर के पास भेजा गया ताकि सरकारी नियमों के तहत गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM Portal) पर बिड (टेंडर) आमंत्रित की जा सके।

कलेक्टर का सख्त आदेश जिसे अनदेखा किया गया:
तत्कालीन कलेक्टर ने फाइल का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि इस खरीदी में नियमों की अनदेखी हो रही है। उन्होंने नोटसीट पर अपने पेन से साफ शब्दों में लिखा कि—"शासन संचालनालय से सीएमएचओ के आदेश की पुष्टि होने के बाद ही आगामी कार्रवाई की जाए।" इसके साथ ही कलेक्टर ने जेम पोर्टल पर बिड प्रक्रिया आयोजित करने पर पूरी तरह रोक लगा दी और नस्ती (फाइल) सीएमएचओ कार्यालय को वापस लौटा दी।

कलेक्टर की यह स्पष्ट रोक भ्रष्टाचार के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा थी। लेकिन डॉ. अनुराग शर्मा ने प्रशासनिक मर्यादाओं और नियमों को दरकिनार करते हुए क्रय लिपिक (Purchase Clerk) को मौखिक और लिखित निर्देश देकर जेम पोर्टल पर टेंडर लाइव करवा दिया। नियमों को ताक पर रखकर 14 मार्च 2026 को इस अवैध बिड को ओपन (खोल) भी कर दिया गया।

कुर्सी पर लौटते ही डॉ. यत्नेश त्रिपाठी ने बहती गंगा में हाथ कैसे धोया?
जब डॉ. अनुराग शर्मा जेम पोर्टल पर अवैध टेंडर की प्रक्रिया पूरी कर चुके थे, उसी दौरान कोर्ट से स्थगन या राहत मिलने के बाद डॉ. यत्नेश त्रिपाठी ने दोबारा रीवा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) का पदभार संभाल लिया। एक ईमानदार अधिकारी के तौर पर डॉ. यत्नेश त्रिपाठी को पद संभालते ही पुरानी फाइलों और टेंडर का रिव्यू करना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

जांच दल के मुताबिक, डॉ. यत्नेश त्रिपाठी ने इस अवैध टेंडर प्रक्रिया को रोकने के बजाय इसमें अपनी संलिप्तता दर्ज कराना बेहतर समझा। उन्होंने पिछली नोटसीट पर कलेक्टर द्वारा लगाई गई रोक को जानबूझकर नजरअंदाज किया और आनन-फानन में संबंधित सप्लायर फर्म को दवाइयों की सप्लाई का क्रय आदेश (Purchase Order) जारी कर दिया। दवाइयों की तथाकथित डिलीवरी के तुरंत बाद, 24 मार्च 2026 को 35,47,205 रुपये के भारी-भरकम भुगतान की फाइल तैयार की गई। इस बार चतुर अधिकारियों ने फाइल को इस तरह घुमाकर प्रस्तुत किया कि कलेक्टर से वित्तीय अनुमोदन प्राप्त कर लिया गया और सरकारी खजाने से पूरी राशि सप्लायर के खाते में ट्रांसफर कर दी गई।

स्टोर कीपर रवि दुबे का लालच: कैसे जाल में फंसे दोनों मुख्य चिकित्सा अधिकारी?
इस पूरे 35 लाख रुपये के खेल के पीछे मुख्य सूत्रधार या मास्टरमाइंड जिला स्वास्थ्य विभाग का स्टोर कीपर (स्टोर प्रभारी) रवि दुबे बताया जा रहा है। रवि दुबे के खिलाफ पहले से ही वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की कई गंभीर शिकायतें चल रही थीं, जिनकी गूंज मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) तक पहुंच चुकी थी।

[पूर्व जेडी का आदेश] ──> डॉ. संजीव शुक्ला ने रवि दुबे को स्टोर से हटाया
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[डॉ. यत्नेश की वापसी] ──> रवि दुबे ने दोबारा प्रभाव जमाया (35 लाख का टेंडर खेल)

रवि दुबे की लगातार मिल रही शिकायतों को देखते हुए तत्कालीन संयुक्त संचालक (JD) ने पूर्व सीएमएचओ डॉ. संजीव शुक्ला को पत्र लिखकर रवि दुबे को तत्काल प्रभाव से सीएमएचओ कार्यालय के मुख्य स्टोर से हटाकर जिला अस्पताल अटैच करने के निर्देश दिए थे। अपने रिटायरमेंट से ठीक पहले डॉ. संजीव शुक्ला ने रवि दुबे को स्टोर से कार्यमुक्त भी कर दिया था। लेकिन जैसे ही डॉ. यत्नेश त्रिपाठी की वापसी हुई, रवि दुबे ने अपने रसूख और लालच का जाल फैलाकर दोबारा स्टोर पर कब्जा कर लिया और दोनों सीएमएचओ को इस गंभीर घोटाले के दलदल में धकेल दिया।

 जांच टीम के सामने फाइलों को छुपाने की कोशिश और कमिश्नर का कड़ा एक्शन
जब इस अवैध खरीदी की भनक क्षेत्रीय संचालक (स्वास्थ्य सेवाएं) को लगी, तो उन्होंने तत्काल मामले की गंभीरता को देखते हुए एक चार सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच दल का गठन कर दिया। लेकिन भ्रष्टाचार में डूबे स्वास्थ्य विभाग के बाबुओं और अधिकारियों के हौसले इतने बुलंद थे कि उन्होंने जांच टीम को ही चुनौती दे डाली।

7 अप्रैल 2026 का पहला समन: जांच दल ने सीएमएचओ को पत्र भेजकर 7 अप्रैल को सुबह 11 बजे स्टोर प्रभारी रवि दुबे और संबंधित दस्तावेजों को तलब किया। लेकिन विभागीय साठगांठ के चलते कोई भी कर्मचारी रिकॉर्ड लेकर नहीं पहुंचा।

27 अप्रैल 2026 की दूसरी डेडलाइन: जांच टीम ने दोबारा कड़ा पत्र लिखा। इसी बीच रीवा संभाग के कमिश्नर ने भी इस मामले को संज्ञान में लेते हुए अपने स्तर से जांच के आदेश जारी कर दिए।

11 मई 2026 को हुआ सरेंडर: कमिश्नर का डंडा चलते ही स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों में खलबली मच गई। आखिरकार, घबराए स्टोर कीपर को 11 मई को सारे काले चिट्ठों और फाइलों के साथ जांच दल के सामने पेश होना पड़ा। दस्तावेजों की स्क्रूटनी करते ही पूरा फर्जीवाड़ा परत-दर-परत खुलकर सामने आ गया।

जांच रिपोर्ट कमिश्नर को सौंपी: अब दोनों दोषी डॉक्टरों पर क्या कार्रवाई होगी?
चार सदस्यीय जांच दल ने अपनी अंतिम जांच रिपोर्ट और अभिमत क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं एवं कमिश्नर कार्यालय को सौंप दिया है। जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि यह पूरी खरीदी पूरी तरह से अवैध, नियमों के विरुद्ध और वित्तीय गबन की श्रेणी में आती है।

जांच टीम का मुख्य निष्कर्ष:
तत्कालीन प्रभारी सीएमएचओ डॉ. अनुराग शर्मा सीधे तौर पर दोषी हैं क्योंकि उन्होंने कलेक्टर की लिखित रोक के बावजूद जेम पोर्टल पर बिड आयोजित करने के आदेश दिए। वहीं, डॉ. यत्नेश त्रिपाठी बराबर के दोषी हैं क्योंकि उन्होंने बिना नोटसीट का अध्ययन किए और बिना नियमों को देखे सीधे भुगतान के आदेश जारी कर दिए। स्टोर प्रभारी रवि दुबे इस पूरे षड्यंत्र का मुख्य हिस्सा रहा है।

अब आगे क्या होगा?
जांच रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद अब रीवा कमिश्नर और राज्य शासन के स्तर से बड़ी कार्रवाई की तैयारी है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, दोषी पाए गए दोनों सीएमएचओ (डॉ. अनुराग शर्मा और डॉ. यत्नेश त्रिपाठी) के साथ-साथ स्टोर कीपर रवि दुबे का तत्काल निलंबन (Suspension) किया जा सकता है। इसके अलावा, गबन की गई 35 लाख रुपये से अधिक की राशि की रिकवरी (Recovery) इन अधिकारियों की संपत्ति और वेतन से करने के आदेश जारी हो सकते हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) या एफआईआर (FIR) की कार्रवाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

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