समान क्षेत्र बना अवैध अस्पतालों का अड्डा: डॉक्टर सरकारी अस्पताल के और नर्सिंग होम और अस्पताल प्राइवेट, जमीनी दस्तावेजों की उच्चस्तरीय जांच सहित जमींदोज करने की उठी मांग

 
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ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के रीवा शहर में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर चल रहे काले कारोबार का पर्दाफाश अब पूरी तरह से होने लगा है। शहर में हाल ही में आयुष्मान हॉस्पिटल पर हुई औचक प्रशासनिक रेड और उसके बाद सामने आए तथ्यों ने प्राइवेट अस्पतालों और नर्सिंग होम की पोल खोलकर रख दी है. स्थिति यह है कि रीवा में संचालित हो रहे अधिकांश निजी अस्पताल और नर्सिंग होम सरकारी नियमों, निर्माण मानकों और सुरक्षा मापदंडों पर बिल्कुल भी खरे नहीं उतर रहे हैं।

इन संस्थानों के पास न तो पर्याप्त स्टाफ है, न ही मरीजों के वाहनों के लिए पार्किंग की कोई ठोस व्यवस्था है और सबसे खतरनाक बात यह है कि फायर सेफ्टी (अग्निशमन यंत्र) के नाम पर भी केवल खानापूर्ति की जा रही है। शहर के भीतर 50 से अधिक निजी नर्सिंग होम नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से चलाए जा रहे हैं, जिसके खिलाफ अब जनता और जनप्रनिधियों का आक्रोश सातवें आसमान पर पहुंच गया है।

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वार्ड 13 की पार्षद नम्रता संजय सिंह की हुंकार: भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ लंबी लड़ाई
रीवा के वार्ड क्रमांक 13 की तेज-तर्रार पार्षद नम्रता संजय सिंह शुरू से ही इन अवैध रूप से संचालित होने वाले निजी नर्सिंग होम और अस्पतालों के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाती रही हैं। पार्षद ने पूर्व में भी नगर निगम की परिषद बैठकों में इस गंभीर मामले को पुरजोर तरीके से उठाया था और अस्पतालों के संचालन से जुड़े दस्तावेज और जानकारियां मांगी थीं, परंतु दुर्भाग्यवश उस समय प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव के चलते इस महत्वपूर्ण मुद्दे को दबा दिया गया था।

पार्षद नम्रता संजय सिंह का साफ कहना है कि इन नर्सिंग होम के संचालन और बड़े-बड़े भवन निर्माण की अनुमतियां बिना किसी जमीनी मापदंड और अध्ययन के जारी कर दी गईं। इसी प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार का खामियाजा आज पूरा रीवा शहर और यहां की आम जनता अपनी जान और गाढ़ी कमाई देकर भुगत रही है। रिहायशी बस्तियों और कॉलोनियों के बीच नियमों के विरुद्ध अस्पताल खोल दिए जाने के कारण आज स्थिति यह हो गई है कि आम नागरिकों का जीना मुहाल हो गया है। एक तरफ जहां माननीय न्यायालय कॉलोनियों के बीच व्यावसायिक निर्माण और दुकानों के संचालन पर सख्त पाबंदी और कार्रवाई के आदेश जारी कर रहा है, वहीं रीवा में इन आदेशों की धज्जियां सरेआम उड़ाई जा रही हैं।

आरटीआई कार्यकर्ता संजय सिंह के खुलासे: भूमि मापदंडों और निर्माण नियमों की उड़ रही धज्जियां
इस पूरे घोटाले में आरटीआई (RTI) कार्यकर्ता संजय सिंह द्वारा किए गए खुलासे बेहद चौंकाने वाले हैं। उनके अनुसार, चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग के नियमों के मुताबिक किसी भी अस्पताल के निर्माण और संचालन के लिए भूमि का दायरा तय होता है:

  • 100 बिस्तर (Beds) वाले अस्पतालों के लिए: कम से कम 5 से 6 हेक्टेयर भूमि अनिवार्य रूप से होनी चाहिए।
  • 30 से 100 बिस्तर के अस्पतालों के लिए: 3 से 5 हेक्टेयर भूमि का होना कानूनन जरूरी है।
  • 30 बिस्तर तक के छोटे अस्पतालों के लिए: कम से कम 2 से 4 हेक्टेयर भूमि का प्रावधान है।

परंतु, चौंकाने वाली सच्चाई यह है कि रीवा शहर के भीतर एक भी ऐसा निजी अस्पताल या नर्सिंग होम नहीं है, जो इन बुनियादी मापदंडों को पूरा करता हो। अधिकांश बड़े अस्पताल घनी आबादी वाले रिहायशी क्षेत्रों और तंग कॉलोनियों के बीच खड़े कर दिए गए हैं, जिनके पास न तो ओपन एरिया है और न ही वेंटिलेशन या आपातकालीन निकास की उचित व्यवस्था।

समान क्षेत्र बनता जा रहा अवैध अस्पतालों का गढ़: पार्किंग और ट्रैफिक का महा-संकट
रीवा का समान थाना क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में तेजी से एक अनियोजित और अवैध मेडिकल हब के रूप में विकसित हो चुका है। समान बस स्टैंड से लेकर पीटीएस रोड तक की मुख्य सड़क पर बड़े-बड़े अस्पतालों की बाढ़ आ गई है। इनमें रीवा हॉस्पिटल, प्रार्थना हॉस्पिटल, मेट्रो हॉस्पिटल, वरदान हॉस्पिटल और हाल ही में सुर्खियों में आया आयुष्मान हॉस्पिटल जैसे कई नाम शामिल हैं। इसके अलावा, संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल के कई गैस्ट्रोलॉजिस्ट और अन्य डॉक्टर भी आयुष्मान हॉस्पिटल के ठीक बगल में अपने निजी अस्पताल और क्लीनिक खोलने की फिराक में हैं।

इन अस्पतालों के सामने सबसे बड़ी विसंगति पार्किंग की अनुपलब्धता है। नियमतः हर अस्पताल के पास उसकी क्षमता के अनुसार विशाल पार्किंग एरिया होना चाहिए, ताकि मरीज और उनके तीमारदार वाहन सड़क पर न खड़ा करें। परंतु यहां स्थिति इसके विपरीत है। इन अस्पतालों के बाहर बेतरतीब खड़े होने वाले वाहनों के कारण इस मार्ग पर हमेशा भयंकर ट्रैफिक जाम लगा रहता है, जिससे एम्बुलेंस तक का निकलना दूभर हो जाता है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि सरकारी संजय गांधी अस्पताल में पदस्थ डॉक्टर अपनी ड्यूटी के समय इन निजी अस्पतालों में सेवाएं दे रहे हैं, और इनमें से एक डॉक्टर तो हाल ही में कलेक्टर और एसपी की संयुक्त रेड के दौरान रंगे हाथों पकड़ा भी जा चुका है।

कलेक्टर और एसपी के निरीक्षण के बाद खुली आंखें, सभी को जमींदोज करने की उठी मांग
जब जिला प्रशासन के मुखिया यानी कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक (SP) ने खुद मैदान में उतरकर औचक निरीक्षण किया, तब जाकर इन फर्जीवाड़े और नियमों की अनदेખી की परतें उघड़कर सामने आईं। इस औचक कार्रवाई ने प्राइवेट अस्पतालों के मालिकों और उनमें रोटियां सेकने वाले भ्रष्ट अधिकारियों के खेमे में हड़कंप मचा दिया है।

इसे देखते हुए वार्ड 13 की पार्षद नम्रता संजय सिंह ने जिला कलेक्टर को एक बार फिर स्पष्ट और कड़ा ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि रीवा शहर के चप्पे-चप्पे पर संचालित हो रहे सभी नर्सिंग होम और प्राइवेट अस्पतालों की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। उन्होंने मांग की है कि:

  • राजस्व अभिलेखों में दर्ज मूल भूमि और वर्तमान में अस्पताल के रूप में उपयोग हो रही भूमि का वास्तविक भौतिक मिलान किया जाए।
  • भवनों के निर्माण की अनुमति, लैंड यूज (भूमि उपयोग), पार्किंग व्यवस्था, और अग्निशमन (Fire Safety) के पुख्ता इंतजामों की गहनता से जांच हो।
  • जांच के दौरान जो भी अस्पताल या नर्सिंग होम नियम विरुद्ध संचालित पाए जाएं, उनके लाइसेंस तुरंत निरस्त कर उनके अवैध भवनों को जमींदोज किया जाए।

इसके साथ ही, बिना नियमों की परवाह किए इन अवैध संस्थानों को धड़ल्ले से निर्माण और संचालन की अनुमतियां बांटने वाले भ्रष्ट और लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ भी कठोर से कठोर अनुशासनात्मक एवं आपराधिक कार्रवाई की जाए।

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