"इलाज फेल, शव वाहन पास! डिप्टी सीएम के रीवा में जान बचाने से ज्यादा मुस्तैद रहा लाश ढोने का सिस्टम"
रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था को हाईटेक और आधुनिक बनाने के लिए लगातार बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं। वर्तमान में भी लगभग 350 करोड़ रुपये सिर्फ अस्पताल के इन्फ्रास्ट्रक्चर और नई बिल्डिंग्स के निर्माण पर खर्च किए जा रहे हैं। जिला अस्पताल को अपग्रेड किया गया है, और सुपर स्पेशलिटी अस्पताल जैसी बड़ी सौगातें भी रीवा को मिली हैं। लेकिन इन गगनचुंबी इमारतों के भीतर इलाज की क्या स्थिति है, यह शव वाहन के आंकड़े साफ बयां कर रहे हैं।
डॉक्टरों और स्टाफ की भारी कमी:
अस्पताल की भव्य इमारतें तो खड़ी कर दी गईं, लेकिन मरीजों का इलाज करने के लिए डॉक्टरों और विशेषज्ञ सर्जनों की भर्ती करना सिस्टम पूरी तरह भूल गया।
- अकेले रीवा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के 80 से अधिक पद खाली पड़े हैं।
- वेंटिलेटर और आईसीयू जैसी आधुनिक मशीनें तो हैं, लेकिन उन्हें ऑपरेट करने वाले तकनीकी विशेषज्ञों की भारी कमी है।
- ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति इतनी खराब है कि वहां से सामान्य मरीजों को भी सीधे रीवा मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है, जिससे बड़े अस्पतालों पर दबाव जरूरत से ज्यादा बढ़ जाता है।
- स्थिति यह हो चुकी है कि रीवा के सरकारी अस्पतालों में आने वाले गंभीर मरीजों के परिजनों को इस बात की कोई गारंटी नहीं मिलती कि उनका मरीज ठीक होकर घर लौटेगा या नहीं। अस्पताल आने वाले कई मरीज अपने पैरों पर चलकर तो आते हैं, लेकिन उनकी वापसी सरकारी शव वाहन में होती है।
नियम और शर्तें: सरकारी अस्पतालों में मौत होने पर ही मिलेगी इस योजना का लाभ
सरकार ने इस योजना का खाका इस तरह तैयार किया है कि इसका दुरुपयोग न हो सके, लेकिन इसके कड़े नियमों के कारण यह केवल सरकारी अस्पतालों तक ही सीमित है। यदि आप भी इस सेवा की शर्तों के बारे में जानना चाहते हैं, तो निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान से पढ़ें:
- शासकीय अस्पताल में मृत्यु: इस नि:शुल्क शव वाहन का लाभ केवल उन्हीं परिवारों को मिल सकता है जिनके परिजन का निधन किसी शासकीय अस्पताल (जैसे मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल, सिविल अस्पताल, सीएचसी या पीएचसी) में उपचार के दौरान हुआ हो।
- पोस्टमार्टम (PM) केस: यदि किसी व्यक्ति का शव शासकीय अस्पताल या मेडिकल कॉलेज में पोस्टमार्टम के लिए लाया गया है, तो पीएम प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव को घर ले जाने के लिए यह वाहन पूरी तरह निःशुल्क मिलेगा।
- निजी अस्पतालों के लिए पात्रता नहीं: यदि किसी मरीज की मृत्यु किसी प्राइवेट हॉस्पिटल या घर पर होती है, तो वे इस सरकारी योजना के तहत मुफ्त शव वाहन पाने के हकदार नहीं होंगे।
- गंतव्य स्थान: वाहन शव को अस्पताल से सीधे मृतक के निवास स्थान या उनके नजदीकी श्मशान घाट/कब्रिस्तान तक ही छोड़ता है।
प्रदेश में शव वाहन का मंथवार निरूशुल्क उपयोग का आंकड़ा
मंथ कुल संख्या
अगस्त 25 1625
सितंबर 25 2594
अक्टूबर 25 2387
नवंबर 25 2385
दिसंबर 25 2451
जनवरी 26 2300
फरवरी 26 2144
मार्च 26 2211
अप्रैल 26 2411
योग 20508
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जिला वार आंकड़ा
जिला शव वाहन उपयोग संख्या
रीवा 1129
छिंदवाड़ा 790
शहडोल 740
शिवपुरी 642
पन्ना 635
सागर 675
सतना 582
बैतूल 631
छतरपुर 595
दमोह 572
विदिशा 481
उज्जैन 416
अनूपपुर 405
मऊगंज 117
राहत देने वाली योजना जो स्वास्थ्य विभाग की नाकामी का दस्तावेज बन गई
अंततः, इस पूरी रिपोर्ट का विश्लेषण किया जाए तो सिक्के के दो पहलू नजर आते हैं। पहला पहलू बेहद मानवीय और सराहनीय है; सरकार की इस पहल से उन गरीब, शोषित और बेबस परिवारों को बहुत बड़ी राहत मिली है, जो पहले कफन-दफन और गाड़ी के भाड़े के लिए कर्ज लेने को मजबूर होते थे। अब वे कम से कम अपने अपनों का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ कर पा रहे हैं।
लेकिन, इसका दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे, विशेषकर रीवा जिला प्रशासन के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यदि किसी एक ही जिले से 9 महीने में 1,100 से अधिक शव सरकारी अस्पतालों से निकल रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर चिकित्सा प्रणाली के 'आईसीयू' में होने का संकेत है। बिल्डिंगें खड़ी कर देने से जनता की जान नहीं बचती, जान बचाने के लिए डॉक्टरों, दवाओं और संवेदनशील सिस्टम की जरूरत होती है। सरकार को जल्द ही रीवा समेत पूरे प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के खाली पदों को भरना होगा, अन्यथा ये शव वाहन इसी तरह रिकॉर्ड बनाते रहेंगे और स्वास्थ्य व्यवस्था दम तोड़ती रहेगी।