विंध्य के मरीजों की चीख: अस्पताल नहीं, 'रेफर सेंटर' चल रहे हैं; सरकारी वेतन लेकर निजी तिजोरी भरने वाले डॉक्टरों पर कब गिरेगी गाज?

 
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संजय गांधी अस्पताल में बढ़ती भीड़ और निजी नर्सिंग होम का मायाजाल; आखिर क्यों गरीब मरीज बन गया है 'रेफर' होने का जरिया? उपमुख्यमंत्री से जनता ने मांगे जवाब।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। विंध्य का हृदय स्थल कहा जाने वाला रीवा आज एक अजीबोगरीब 'हेल्थ मॉडल' का गवाह बन रहा है। एक तरफ उपमुख्यमंत्री के प्रयासों से खड़ी हुई अत्याधुनिक इमारतें और सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की चमक है, तो दूसरी तरफ उन इमारतों के साये में पनपता निजी नर्सिंग होम का वह साम्राज्य है जो गरीब मरीजों की जेब और उम्मीदों पर टिका है।

'सरकारी कुर्सी' से 'निजी क्लिनिक' तक का सफर: डॉक्टर कॉलोनी में अवैध साम्राज्य
रीवा की डॉक्टर कॉलोनी आज सरकारी सेवा का नहीं, बल्कि निजी व्यवसाय का केंद्र बन चुकी है। नियम कहते हैं कि सरकारी आवासों में व्यावसायिक गतिविधियां प्रतिबंधित हैं, लेकिन यहाँ का सच अलग है। कई विशेषज्ञ डॉक्टर सरकारी ओपीडी से गायब रहकर अपने घर के बाहर लगी लंबी लाइनों को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं। मरीज जब सरकारी अस्पताल पहुंचता है, तो उसे 'बेहतर और व्यक्तिगत ध्यान' के नाम पर डॉक्टर कॉलोनी की गलियों का रास्ता दिखा दिया जाता है। क्या स्वास्थ्य विभाग इन खुली आंखों से हो रहे अवैध क्लीनिकों से अनजान है?

संजय गांधी अस्पताल: क्या यह सिर्फ एक 'रेफर सेंटर' बनकर रह गया है?
मध्य प्रदेश के सबसे बड़े अस्पतालों में शुमार संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय (SGMH) आज खुद इलाज की राह देख रहा है। ओपीडी में डॉक्टरों का इंतजार करते मरीज और वार्डों में बेड के लिए भटकते तीमारदार—यह यहाँ की रोज की कहानी है। गंभीर मरीजों को बिना किसी पुख्ता प्रयास के जबलपुर, नागपुर या प्रयागराज के लिए रेफर कर देना अब आम हो चुका है। ऐसा लगता है कि सरकारी तंत्र ने निजी नर्सिंग होम के लिए 'कस्टमर' भेजने का अनकहा ठेका ले रखा है।

सिफारिश की 'दवा' और VIP कल्चर का बोलबाला
अस्पताल में समानता का अधिकार अब केवल कागजों तक सीमित है। जनचर्चा है कि अगर आपके पास किसी रसूखदार नेता, सांसद या विधायक की सिफारिश है, तो आपके लिए निजी कक्ष (Private Room) और डॉक्टरों की विशेष टीम हाजिर हो जाएगी। वहीं, दूर-दराज के गांवों से आने वाला गरीब आदमी घंटों लाइन में लगकर केवल 'रेफर' होने का इंतजार करता है। क्या इलाज अब बीमारी देखकर नहीं, बल्कि पहचान देखकर होगा?

निजी नर्सिंग होम: कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ता 'कमीशन' का धंधा
शहर की हर मुख्य सड़क पर खुलते आलीशान नर्सिंग होम इस बात का प्रमाण हैं कि यहाँ का मेडिकल बिजनेस कितना मुनाफा दे रहा है। लाखों के बिल, गैर-जरूरी जांचें और महंगी दवाओं का जाल मरीजों को आर्थिक रूप से तोड़ देता है। सवाल यह है कि जब वही डॉक्टर सरकारी अस्पताल में हैं, तो वही सुविधाएं वहाँ क्यों नहीं मिल पातीं? क्या यह निजी अस्पतालों के साम्राज्य को खाद-पानी देने की कोई सोची-समझी साजिश है?

प्रशासनिक डर का अंत: इलैयाराजा टी जैसे सख्त तेवरों की तलाश
रीवा के लोग आज भी पूर्व कलेक्टर इलैयाराजा टी के उस दौर को याद करते हैं, जब डॉक्टर कॉलोनी में पड़ने वाले छापों से डॉक्टरों में प्रशासन का खौफ था। वर्तमान कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी से भी जनता को ऐसी ही सख्त कार्रवाई की उम्मीद है। क्या प्रशासन इन सफेदपोशों के अवैध क्लीनिकों पर ताला लगाने का साहस जुटा पाएगा?

उपमुख्यमंत्री के गृह जिले में 'स्वास्थ्य का रेड अलर्ट'
उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने रीवा को मेडिकल हब बनाने के लिए करोड़ों का निवेश करवाया, नई मशीनें लाए, लेकिन क्या वे 'भरोसा' ला पाए? भाषणों और उद्घाटन की चकाचौंध के बीच गरीब मरीज आज भी नागपुर और जबलपुर भागने को मजबूर है। जनता पूछ रही है कि अगर सरकारी डॉक्टरों की प्राथमिकता ही निजी कमाई है, तो इन करोड़ों की इमारतों का क्या फायदा?

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