Chandra Grahan 2022 : क्या है चंद्र ग्रहण से जुड़े अंधविश्वासों की सच्चाई, क्या है इसके पीछे का राज?

 
image by google

आज इस साल का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण लग रहा है। चंद्र ग्रहण के बारे में सुनते ही लोगों के मन में डर का अहसास होता है। ये कोई नई बात नहीं है, 3158 साल पहले जब पहली बार चंद्र ग्रहण देखा गया था, तब भी लोग डरे थे। करीब 1,700 साल पहले चीनी भाषा की एक किताब में चंद्र ग्रहण को एक वैज्ञानिक घटना बताया गया था।

सबसे पहले आज के चंद्र ग्रहण के बारे में जानिए…

2022 का अंतिम चंद्र ग्रहण
दिन 8 नवंबर

  • ग्रहण शुरू होने का समय 2:38 बजे
  • ग्रहण खत्म होने का समय 6:19 बजे

पहली बार चंद्र ग्रहण कब और कहां लगा था?

  • 280 ईस्वी यानी 1742 साल पहले चीन के 'झोऊ राजवंश' में जुड़े मकबरे में एक किताब मिली थी।
  • चीनी भाषा में लिखी गई इस किताब का नाम 'झोऊ शू' था।
  • इस किताब में सैकड़ों साल पहले चंद्र ग्रहण लगने की बात लिखी थी।
  • रिसर्च प्रोफेसर एस.एम.रसेल ने इस किताब के हवाले से पहली बार चंद्र ग्रहण लगाने की तारीख बताइए है।

पूर्ण चंद्र ग्रहण कहां होगा
देश के पूर्वी भाग कोलकाता, कोहिमा, पटना, पूरी, रांची, ईटानगर के आसपास के शहरों में पूर्ण चंद्रग्रहण होगा।

आंशिक चंद्रग्रहण कहां होगा
लखनऊ, रायपुर, भोपाल, हैदराबाद, चेन्नई, मुंबई, गांधीनगर में आंशिक चंद्रग्रहण रहेगा।

अब जानते हैं कि चंद्र ग्रहण क्या होता है?

  • गुरुत्वाकर्षण बल यानी ग्रेविटेशनल फोर्स की वजह से पृथ्वी और सभी दूसरे ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। पृथ्वी, 365 दिनों में सूर्य का एक चक्कर लगाती है।
  • जबकि चंद्रमा एक प्राकृतिक उपग्रह है, जो पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है। उसे पृथ्वी के एक चक्कर लगाने में 27 दिन लगते हैं।
  • सूर्य के चक्कर लगाने के दौरान कई बार ऐसी स्थिति बनती है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच में आ जाती है। इस दौरान सूर्य का प्रकाश चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाता है और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ने से चंद्र ग्रहण होता है।

चंद्र ग्रहण मुख्य रूप से 3 प्रकार के होते हैं…

  • पूर्ण चंद्र ग्रहण (Total lunar eclipse): पूर्ण चंद्र ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी, सूर्य तथा चंद्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं। इसके कारण पृथ्वी की छाया पूरी तरह से चंद्रमा को ढंक लेती है, जिससे पूरी तरह से चंद्रमा पर अंधेरा छा जाता है।
  • आंशिक चंद्र ग्रहण (Partial lunar Eclipse): जब पृथ्वी की परछाई चंद्रमा के पूरे भाग को ढंकने की बजाय किसी एक हिस्से को ही ढंके तब आंशिक चंद्र ग्रहण होता है। इस दौरान चंद्रमा के केवल एक छोटे हिस्से पर ही अंधेरा होता है।
  • उपछाया चंद्र ग्रहण (Penumbral lunar Eclipse): उपछाया चंद्र ग्रहण तब होता है जब पृथ्वी की छाया चंद्रमा के बाहरी भाग पर पड़ती है। इस तरह के चंद्र ग्रहण को देखना मुश्किल होता है।

कहीं पूर्ण चंद्र ग्रहण और कहीं आंशिक चंद्र ग्रहण लगने की क्या वजह है?
एक हिस्से में पूर्ण चंद्र ग्रहण और दूसरे हिस्से में आंशिक चंद्र ग्रहण लगने की मुख्य वजह चंद्रमा पर पड़ने वाली पृथ्वी की छाया है। ये 2 तरह की होती है…

पहली: प्रच्छाया (Umbra): पूर्ण चंद्र ग्रहण तब दिखाई देता है, जब देखने वाला इंसान पृथ्वी के उस हिस्से में हो जहां से चंद्रमा पूरी तरह से पृथ्वी की छाया से ढंका नजर आता है।

दूसरी: उपछाया (Penumbra): उपछाया से देख रहे दर्शकों को आंशिक चंद्र ग्रहण ही दिखाई देता है।

चंद्र ग्रहण के दिन चंद्रमा लाल क्यों दिखाई देता है?

  • जब चंद्रमा पृथ्वी की प्रच्छाया में होता है, सिर्फ तभी चंद्र ग्रहण के दिन चंद्रमा देखने पर लाल दिखाई देता है। इसकी वजह यह है कि सूर्य का प्रकाश जैसे ही पृथ्वी के वायुमंडल में आता है वो अपने सात रंगों में बंट जाता हैं।
  • इस दौरान सबसे ज्यादा वेवलेंथ गहरे लाल रंग की होती है और सबसे कम वेवलेंथ बैगनी रंग की होती है। ऐसे में कम वेवलेंथ वाले रंग तो पृथ्वी के वायुमंडल में फैल जाते हैं, लेकिन गहरे लाल रंग वाली रोशनी चंद्रमा से टकराती है और वापस लौटकर हम तक पहुंचती है। इसीलिए चंद्र ग्रहण के समय चंद्रमा लाल रंग का दिखाई देता है और इसे हम ब्लड मून भी कहते हैं।

एक साल में कितनी बार चंद्र ग्रहण लग सकता है?
NASA के मुताबिक एक साल में ज्यादातर 2 बार चंद्र ग्रहण होता है। किसी साल चंद्र ग्रहण लगने की संख्या 3 भी हो सकती है। सैकड़ों साल में लगने वाले कुल चंद्र ग्रहणों में से लगभग 29% चंद्र ग्रहण पूर्ण होते हैं। औसतन, किसी एक स्थान से हर 2.5 साल में पूर्ण चंद्र ग्रहण देखा जा सकता है। चंद्र ग्रहण 30 मिनट से लेकर एक घंटे के लिए लगता है।

चंद्र ग्रहण के दौरान पता चली पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी
चंद्र ग्रहण की वजह से कई खास वैज्ञानिक खोज हुई हैं। इनमें से प्रमुख कुछ इस तरह से हैं…

  • 1. 150 ईसा पूर्व यानी आज से करीब 2100 साल पहले चंद्र ग्रहण के दौरान ग्रीस के वैज्ञानिकों ने पृथ्वी का व्यास यानी डायमिटर पता किया था। इससे पता चला कि पृथ्वी कितनी बड़ी है।
  • 2. 400 ईसा पूर्व ग्रीस के वैज्ञानिक अरिस्तर्खुस ने चंद्र ग्रहण की मदद से ही पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी पता की थी।
  • 3. आगे चलकर ग्रीस के एस्ट्रोलॉजर क्लाडियस टॉलमी ने दूसरी सदी यानी 1800 साल पहले इसी के आधार पर दुनिया के सबसे पुराने वर्ल्ड मैप में से एक बनाया था, जिसका नाम टॉलमी वर्ल्ड मैप था।

ग्रहण से जुड़े अंधविश्वास और वैज्ञानिक सच …
पहला: राहु चंद्रमा को निगलने की कोशिश करता है
NASA ने इस तरह के दावों और पौराणिक कथाओं से इनकार किया है। ऐसा सिर्फ और सिर्फ तब होता है जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच में आ जाती है। इस दौरान सूर्य का प्रकाश चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाता है और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ने से चंद्र ग्रहण होता है।

दूसरा: चंद्र ग्रहण की वजह से सुनामी और दूसरी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं
NASA का मानना है कि चंद्र ग्रहण से जुड़ी धार्मिक मान्यता सुनामी या दूसरी प्राकृतिक आपदा आने की वजह नहीं है। दरअसल, इस वक्त पृथ्वी और चंद्रमा एक-दूसरे के काफी नजदीक होते हैं। इसलिए इस समय गुरुत्वाकर्षण बल काफी ज्यादा होता है। यही वजह है कि पृथ्वी के अंदर होने वाले भौगोलिक बदलावों के कारण भूकंप, सुनामी और दूसरी प्राकृतिक आपदाएं चंद्र ग्रहण के बाद आती हैं।

तीसरा: ग्रहण के दौरान पहले से बना खाना खराब हो जाता है
ग्रहण के दौरान खाना खराब होने की बात को मानने से NASA इनकार करता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रहण के दौरान खाना, पीना और दैनिक गतिविधियों को करना पूरी तरह से सुरक्षित है।

चौथा: चंद्र ग्रहण किसी अशुभ की ओर इशारा करता है
NASA इसे मानने से इनकार करता है। साइंटिस्ट इस तरह की बातों को मनोवैज्ञानिक कन्फर्मेशन बायस कहते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि हम आमतौर पर चंद्र ग्रहण को भले ही याद नहीं रखते हैं, लेकिन जब इसके साथ ही कोई घटना घटती है तो हम इसे लंबे समय तक याद रखते हैं।

उदाहरण के लिए 6 सितंबर 1979 को चंद्र ग्रहण लगा था, जिसके एक महीने बाद अक्टूबर-1979 में फिलीपींस में तूफान आया था। इसके बाद दुनिया के कई जगहों पर इस तूफान के लिए चंद्र ग्रहण को जिम्मेदार बताया गया, लेकिन चंद्र ग्रहण के बाद क्या अच्छा हुआ लोगों को ये याद नहीं है।

ग्रहण से जुड़ी कुछ दिलचस्प मान्यताएं

अमेरिका की ग्राफिक्स ऑब्ज वेटरी के डायरेक्टर एडविन क्रप के मुताबिक पुराने समय में इंसान की दिनचर्या प्रकृति के बनाए नियमों पर आधारित थी। इन नियमों में होने वाले जरा से बदलाव इंसान को परेशान कर देते थे। ऐसे में सूरज चंद्रमा काछिपना लोगों को डराता था जहां तरह-तरह की कहानियां शुरू हुई।

यही से अलग-अलग मान्यताओं का जन्म हुआ

  • अमेरिका का कबीला मानता था की सूरज और चांद प्रेमी-प्रेमिका हैं और ग्रहण के दौरान वे धरती से पर्दा करके रोमांस करते हैं।
  • टोगो के लोग मनाते थे की ग्रहण के  दौरान सूरज और चांद आपस में झगड़ा कर रहे होते हैं इसलिए टोगो के लोग ग्रहण के दौरान अपने पुराने झगड़े सुलझाते थे।
  • यूरोप और अमेरिका के कुछ आदिवासी समाज की ऐसी मान्यता है कि ग्रहण के वक्त चांद जख्मी या बीमार हो जाता है, ग्रहण के बाद चांद को इलाज की जरूरत होती है और इलाज चांद की पत्नी करती है।

चंद्रग्रहण का डर दिखाकर कोलंबस ने बचाई जान

  • 1504 में क्रिस्टोफर कोलंबस का जहाज जमैक के तट से टकराया और उनकी शिप में सवाल लोगों के भूखे मरने की नौबत आ गई।
  • कोलंबस ने वहां से स्थानीय लोगों से मदद पाने के लिए उन्हें ग्रहण की सटीक जानकारी दी और कहा कि आकाशीय शक्तियों पर इनका नियंत्रण है।
  • आसपास के लोग डर गए और उन्होंने कोलंबस और उनके लोगों तक भोजन पहुंचा दिया।  इस तरह कोलंबस ने अपनी और साथियों की जान बचा ली।

Related Topics

From Around the Web

Latest News