REWA : नहीं थम रहा विश्वविद्यालय में फर्जीवाड़े का खेल, जिम्मेदार अधिकारियों पर भी पढ़ रहें बड़े आरोप के छीटे : मामले को दबाने का किया जा रहा प्रयास


रीवा। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय में लगातार फर्जीवाड़े से जुड़े घटनाक्रम सामने आ रहे हैं। इन पर पारदर्शी तरीके से जांच कराने के बजाय विश्वविद्यालय प्रबंधन से जुड़े कुछ अधिकारी पर्दा डालने का प्रयास कर रहे हैं। जिसकी वजह से उनकी भूमिका भी सवालों के घेरे में है। प्रबंधन के जिम्मेदार अधिकारियों पर हर बड़े आरोप के छीटे पड़ रहे हैं। इस कारण अधिकारियों द्वारा मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।


कई अधिकारी जो लंबे समय से लगातार जमे हुए हैं अथवा कुछ समय बाहर रहने के बाद फिर विश्वविद्यालय लौट रहे हैं, ऐसे अधिकारियों की भूमिका पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं और वह अब चुप्पी साधे हुए हैं। महीने भर के अंतराल में कई ऐसे मामले सामने आए है, जिनमें विश्वविद्यालय के अधिकारियों की भूमिका सवालों में है।


अधिकारियों के भ्रष्टाचारी रवैए से आहत कुलपति प्रो. पीयूषरंजन अग्रवाल पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं। वर्तमान कुलपति प्रो. एनपी पाठक ने भी स्पष्ट किया है कि वह किसी भी तरह के भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करेंगे। कई घटनाक्रमों में कुलपति के निर्देश के बाद भी जांच में हीलाहवाली की जा रही है। शासन स्तर से भी कई निर्देश विश्वविद्यालय पहुंचे हैं जिसमें पूर्व में किए गए कार्यों में लापरवाही पर जवाब मांगा गया है लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं भेजा गया है।


बिना स्वीकृति नियुक्ति प्रक्रिया का नहीं दिया जवाब
शासन से पद स्वीकृत कराए बिना ही विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने ८४ दैनिक वेतन भोगियों को नियमित कर दिया, साथ ही उन्हें अन्य लाभ भी प्रदान कर दिया है। शासन की ओर से आपत्ति उठाई गई है और इन कर्मचारियों को वेतन नहीं दिया जा रहा है। जिसके चलते अब विश्वविद्यालय के कोष से ही भुगतान हो रहा है। इस पर कई पत्र शासन से आए और उसमें पूछा गया कि विश्वविद्यालय प्रबंधन उन अधिकारियों की भूमिका तय करे जिन्होंने नियमों के विपरीत कार्य करते हुए विश्वविद्यालय को बड़े आर्थिक भार में झोंक दिया है। लगातार इस पत्र का रिमाइंडर भी आ रहा है लेकिन अधिकारियों की ओर से कोई जवाब नहीं दिया जा रहा है।

इन मामलों में चुप्पी साधने का प्रयास

केस-1
विश्वविद्यालय में नियुक्ति के नाम पर फर्जीवाड़ा किया गया, कई युवाओं से बड़ी रकम लेकर फर्जी कॉल-लेटर और नियुक्ति पत्र भी जारी किए गए। गंभीर आरोप यह है कि विश्वविद्यालय कैम्पस में ही इंटरव्यू भी कराए गए। शिकायत सामने आने के बाद स्वयं के स्तर पर कोई जांच नहीं की गई बल्कि पुलिस को मामला भेज दिया गया, जबकि एक कर्मचारी का भी नाम सामने आया था। दो वर्ष पहले फर्जी नियुक्ति पत्र तत्कालीन कुलसचिव बृजेश ङ्क्षसह के नाम पर जारी किए गए थे, वर्तमान में भी सिंह ही हैं और उनकी चुप्पी भी सवालों में है।

केस- 2
दूरवर्ती शिक्षा पद्धति के छात्रों का परीक्षा परिणाम विश्वविद्यालय ने रोक रखा है। कहा गया है कि करीब छह सौ छात्रों का नामांकन और परीक्षा शुल्क जमा ही नहीं किया गया। जबकि शुल्क जमा नहीं था तो प्रवेश पत्र और उत्तर पुस्तिकाओं के साथ प्रश्रपत्र भी क्यों दिए गए। इस सवाल का जवाब नहीं है। जांच के नाम पर कई महीने से हीलाहवाली की जा रही है। कहा जा रहा है कि इसमें बाबुओं से लेकर बड़े अधिकारियों तक सवाल हैं।

केस- 3
विश्वविद्यालय से फर्जी अंकसूची जारी होने का मामला सामने आया है। हाल ही में सिंगरौली जिले के विंध्यनगर के एक बीएड कालेज के छात्र की अंकसूची जांच में फर्जी पाई गई है। संबंधित ने कहा है कि रुपए लेकर विश्वविद्यालय के अधिकारी, कर्मचारियों ने ही बनाकर दिया था। इस मामले को भी विश्वविद्यालय अधिकारियों की ओर से दबाने का प्रयास किया जा रहा है जबकि इस तरह से अन्य अंकसूचियां भी जारी होने की आशंका है।
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