REWA : बड़ी संख्या में बुजुर्गों और भिखारियों की देखभाल के लिए कोई नहीं, प्रशासन के सारे दाबे फेल, नहीं पहुंचाया जा रहा कोई लाभ

रीवा। हर शहर की तरह रीवा में भी बुजुर्गों और भिखारियों की बड़ी संख्या है। हर दिन भिक्षा मांगकर अपना पेट भर रहे हैं। वहीं कुछ ऐसे हैं जो वर्षों से मंदिरों के बाहर रहकर अपना गुजारा कर रहे हैं। मंदिरों के चढ़ावे-प्रसाद से ही इनका पेट भर रहा है। प्रशासन के स्तर पर इनके पुनर्वास को लेकर कोई लाभ नहीं पहुंचाया जा रहा है।

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नगर निगम ने शहर में दो आश्रय स्थल जरूर बना रखे हैं जहां पर इन्हें रात्रि के समय ठहराया जा सकता है लेकिन मंदिरों के बाहर मिलने वाले भोजन की आस में अपना स्थान नहीं छोड़ रहे हैं। एक दिन पहले ही इन बुजुर्गों के साथ प्रशासनिक बर्ताव की जो तस्वीरें सामने आई उससे पूरा मध्यप्रदेश शर्मशार हुआ है। शहर के भीतर रह रहे बुजुर्गों को कचरा वाहन में भरकर शहर के बाहर छोड़ा गया। इस घटना के बाद से दूसरे शहरों के बेसहारा बुजुर्गों के रखरखाव पर सवाल खड़े होने लगे हैं। मीडिया 

ने शहर के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे बुजुर्गों का हाल जाना तो पता चला कि वर्षों से मंदिरों और शहर के कुछ प्रमुख स्थानों पर ही वह अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

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भोजन और पैसे मंदिरों के पास मिल रहे, इसलिए दूर नहीं जाना चाहते

शहर के कोठी शिवमंदिर, चिरहुला हनुमान मंदिर एवं साईं मंदिर के पास दर्जनों की संख्या में बुजुर्ग भिखारी रह रहे हैं। नगर निगम और रेडक्रास सोसायटी द्वारा बनाए गए आश्रय स्थलों में इन्हें रखने का प्रयास किया था लेकिन नहीं गए। इनका कहना है कि वृद्धाश्रम या अन्य जगह जाएंगे तो भोजन की समस्या हो जाएगी। यहां हर तरह के भोजन की सुविधा मिलती है, भंडारों का आयोजन होता है। इतना ही नहीं लोग रुपए और कपड़ों की भी व्यवस्था कर देते हैं। साईंमंदिर के पास रहने वाली गीता देवी, राममनोहर, लक्ष्मी बंसल, दशमती, गुडिय़ा बुनकर, संतोष साकेत, रामजियावन आदि बताते हैं कि उनके जीवकोपार्जन के लिए कोई दूसरा इंतजाम नहीं है। इसलिए मंदिर के पास रहकर ही गुजारा कर रहे हैं। इसमें कइयों का परिवार भी है जो भिक्षा से मिलने वाले रुपए और सामग्री का उपयोग करता है।

शहर में तीन आश्रय स्थल संचालित

शासन द्वारा बेसहारा और जरूरतमंदों को ठहरने के लिए आश्रय स्थल की व्यवस्था दी गई है। नगर निगम द्वारा अस्पताल चौराहे में अटल आश्रयगृह है जहां पर 20 पुरुषों और 10 महिलाओं के लिए व्यवस्था है। दीनदयाल आश्रय स्थल पर एक हाल पर ही 30 लोगों के ठहरने का इंतजाम किया गया है। यहां अस्पताल आने वाले मरीजों के परिजन ठहरते हैं लेकिन भिक्षा मांगने वाले लोग नहीं ठहर रहे और रात्रि में मंदिरों के पास ही गुजारा कर रहे हैं। अधिकांश दिनों में आश्रय स्थल खाली ही रहते हैं। इसी तरह शहर में भारतीय रेडक्रास सोसायटी द्वारा स्वागत भवन में 25 लोगों को ठहरने की आवासीय व्यवस्था है। यहां पर भोजन एवं आवास व्यवस्था नि:शुल्क है।

दुकान के छज्जे के नीचे बिता रही रात

शहर के नीम चौराहे के पास की रहने वाली कलावती जायसवाल बताती है कि वर्षों से मंदिर के बाहर रह रही है। रात्रि में ठहरने के लिए झोपड़ी बना रखी थी, जिसे कुछ दिन पहले ही नगर निगम वालों ने तोड़ दिया है। मंदिर के बाहर दिन भर नाली के किनारे बैठी रहती है, यहीं पर खाने की सामग्री मिल जाती है। रात्रि में दूसरे कुछ भिखारियों के साथ जब दुकानें बंद हो जाती हैं तो उनके छज्जे के नीचे रहती है। बारिश के दिनों में समस्या होगी। कलावती छह सौ रुपए पेंशन तो पाती हैं लेकिन घर एक कमरे का है जिसमें बेटा और बहू रहते हैं, इसलिए वह घर नहीं जाना चाहती।

भिक्षा से चला रहे परिवार

तराई क्षेत्र के गढ़ी गांव के रहने वाले रामलाल कोल ने बताया कि दस साल पहले वह रीवा आए। पहले कोठी शिवमंदिर और अब साईं मंदिर के पास रहकर भिक्षा मांग रहे हैं। यहां जो रुपए और सामग्री भिक्षा में मिलती है उसे परिवार के लोगों तक पहुंचाते हैं। रामलाल अपनी वास्तविक आयु नहीं जानते लेकिन अनुमान 65 वर्ष का मान रहे हैं। इनका कहना है कि वृद्धापेंशन का लाभ भी नहीं मिल रहा है। मंदिर छोड़कर दूसरी जगह जाना नहीं चाहते, इनका कहना है कि प्रशासन यहां से नहीं हटाए तो यही बड़ी मेहरवानी होगी।

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