MP के इस जि‍ले में महिलाओं की टोली फाग गाकर वसूलती हैं फगुआ

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छिंदवाड़ा। होली का त्योहार सभी लोग धूमधाम से मनाते हैं, छिंदवाड़ा जिले की गिनती आदिवासी बहुल जिले के तौर पर होती है। होली को लेकर आदिवासी समाज अलग तरह की परंपरा निभाता है। प्राकृतिक सौंदर्य समेटे तामिया पातालकोट के आदिवासी, भरिया जाति के लोग कई सालों से अनोखी होली मनाते चले आ रहे हैं। यहां होलिका दहन के अगले दिन धुरेंडी में महिलाओं की टोली आदिवासी संस्कृति में फाग गाकर फगुआ वसूलती है।

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इसके बाद ही रास्ते से गुजर रहे पुरुषों को तिलक लगाकर छोड़ती हैं। सालों से ये परंपरा चली आ रही है, कोरोना संक्रमण के चलते इस साल ये परंपरा प्रतिकात्मक तौर पर होगी, लेकिन सालों पुरानी परंपरा लोगों के आकर्षण का केंद्र रहती है। यहां पुरुष और महिलाएं होली के दिन परंपरा मानते हुए एक साथ बैठकर हाथों से बनाई हुई महुआ की कच्ची शराब पीते हैं।

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हालांकि समय बीतने के साथ परंपराएं पहले जैसी नहीं रही हैं, लेकिन बुजुर्ग लाेग अभी तक इस प्रकार की परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं। सलकिया गांव के 50 वर्षीय सुमेर और 45 वर्षीय सुकंशी ने बताया कि यहां पतालकोट से लगे हुए कसोतिया, चिमटीपुर, सिदोली, खुर्सीढाना, सालीवाड़ा, मरकाढाना गांव में भरिया आदिवासी लोग आज भी प्राकृतिक होली खेलते हैं। टेसू के फूल से रंग बनाकर बांस की पिचकारी में भरकर लोगों पर छिड़कते हैं। वहीं चेहरों पर पीली मिटटी लगाते हैं।

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