REWA : ECO- PARK प्रोजेक्ट का नहीं है नामोनिशान ,19 करोड़ जनता के बहे : सरकार ने साधी चुप्पी


रीवा। मध्य प्रदेश में पिछले बीस साल के दौरान सत्ता के सिंहासन पर भारतीय जनता पार्टी का दबदबा सबसे अधिक रहा। इस दौरान विकास की गंगा भाजपा नेताओं के कथनासुर पूरे मध्यप्रदेश में बही है। निस्संदेह निर्माण रुपी विकास की गंगा हमारे विंध्य प्रदेश के रीवा शहरी क्षेत्र में भी काफी हद तक देखने को मिली है। पिछले पंद्रह सालों तक निरंतर भाजपा सत्ता सीन मध्य प्रदेश में रही।

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विंध्य प्रदेश के संभागीय मुख्यालय रीवा में भी निर्माण रुपी विकास जिम्मेदारी के साथ करवाया गया है जो नजर भी आता है। फिर चाहे बाईपास की बात करें या फिर फ्लाईओवर निर्माण की। राजकपूर आडिटोरियम, कलेक्ट्रेट भवन के साथ सरदार वल्लभ भाई पटेल नया बस स्टैंड की सौगात मिली। गुढ के सोलर पावर प्लांट को भी विकास और उपलब्धि में जोड़ा जा रहा है पर तत्कालीन कमलनाथ सरकार के 70ऽ स्थानीय बेरोजगारों को नौकरी देने की अनिवार्यता दूर तक नजर नहीं आती है। मुकुंदपुर टाइगर सफारी पर भी अधिकार जताने का प्रयास किया गया लेकिन सतना जिला इसमें बाजी मार गया।

अनंतपुर फिल्टर प्लांट जरुर जनता से जुड़ा डेवलपमेंट है जो बराबर विस्तारित नहीं हो पाया। भाजपा शासनकाल के दौरान ही साल 2013 में शहर के मध्य से गुजरने वाली बीहर नदी पर टापू, ईको पार्क और झूला पुल जैसे डेवलपमेंट को लेकर विकास पुरुष ने भूमि-पूजन किया था।

तकरीबन 19 करोड़ रुपए का यह हाई-फाई प्रोजेक्ट शुरू होने के पहले ही समाप्त हो गया। मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार होने के कारण भारी भरकम बजट वाले प्रोजेक्ट के पानी में बह जाने के बाद भी किसी तरह के सवाल जवाब नहीं किए गए। विकास पुरुष की मंशा अनुसार इंदौर की रुचि प्राईवेट लिमिटेड कंपनी को ईको पार्क और झूला पुल निर्माण कार्य का ठेका दिया गया था। तकरीबन तीन साल में बीहर नदी पर झुला पुल तैयार हो गया, लेकिन रिमही जनता को सर्मपित करने के पहले ही विकास पुरुष का यह अजीबोगरीब प्रोजेक्ट बाढ़ के पानी के साथ एक झटके में बह गया।

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19 अगस्त 2016 के दिन संभागीय मुख्यालय में बाढ़ का मंजर देखने को मिला था, बीहर नदी में अचानक बढ़े पानी और उसकी रफ्तार भाजपा सरकार के झुला पुल को हमेशा के लिए अपने साथ ले गयी।

आज भी संभागीय मुख्यालय में बने बड़े पुल अथवा छोटी पुल पर खड़े हो जाए तो भाजपाई शासनकाल के विकास से संबंधित जीवाश्म जरुर देखने को मिलता है। जिस संभागीय मुख्यालय रीवा में विकास की गंगा आज भी जुबानी अंदाज में बह रही है, वहां पर आधे से अधिक रिहायशी इलाकों में रहने वाली जनता को मूलभूत सुविधाएं नसीब नहीं हो पाई हैं।

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आम जनता को आवागमन के लिए सुविकसित सड़क, पानी निकासी के लिए नालियां, पेयजल आपूर्ति के लिए पाइप लाइन, बराबर बिजली आपूर्ति व्यवस्था जैसी सुविधाएं ही चाहिए, जो उनका मूल अधिकार है। अफसोस रिमही जनता के लिए बुनियादी विकास को संभव बनाने का काम पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ नगर निगम एरिया में नहीं करवाया गया।

कीमती जमीनें गंवाईं, बस स्टैंड-आडिटोरियम और कलेक्ट्रेट भवन जरुर मिला
विंध्य क्षेत्र की राजनीति मध्य प्रदेश के सत्ता के सिंहासन के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह वही सफेद शेर की धरती है जहां पर पूर्व मुख्यमंत्री सहित तमाम प्रशासनिक अधिकारियों को सबसे पहले माथा टेकना पड़ता था, वह दौर रीवा के स्वर्णिम इतिहास में समाहित है। यह दौर गुजर जाने के बाद पिछले पंद्रह सालों में रीमहा का पहले जैसा जलवा अफसोस सरकार स्तर पर देखने को नहीं मिला। ईको पार्क और झूला झूल जैसे बेमतलब के प्रोजेक्ट पर जनता का पैसा पानी में बहाने का कीर्तिमान स्थापित करने वाले विकास पुरुष ने संभागीय मुख्यालय रीवा में पिछले पंद्रह सालों के दौरान जिन विकास कार्यों को जनता के लिए उपलब्धि प्रचारित किया गया जबकि उससे आम जनता का कोई खास सरोकार नहीं था।

पिछले पंद्रह सालों में रीवा विधानसभा क्षेत्र खासकर नगर निगम एरिया तक विकास सीमित रहा। यही वजह है कि रीवा जिले के अन्य अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में विकास पुरुष को लेकर नेताओं और जनमानस में विरोध अंदर ही अंदर बढ़ता गया। चौथी बार भाजपा सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल न होने के पीछे अन्य विधानसभा क्षेत्रों की सुनियोजित उपेक्षा को सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। जिन गिनती के निर्माण कार्यों को विकास पुरुष की उपलब्धियों में गिना जाता है उसके लिए संभागीय मुख्यालय में मौजूद बेशकीमती सरकारी जमीनों को योजनाबद्ध तरीके से ठिकाने लगाया गया।

रीवा शहर के सिरमौर चौराहा, चूना भट्ठा समान सहित कुछ अन्य क्षेत्र की सरकारी जमीन चहेते बिल्डर्स को सौंपी गई, इसके एवज में रीवा शहर के अंदर आलीशान कलेक्ट्रेट भवन, कृष्णा राज कपूर ऑडिटोरियम, सरदार वल्लभ भाई पटेल न्यू बस स्टैंड जैसी सौगात भाजपा सरकार के जमाने में मिली है।

रीवा के प्रबुद्धजनों के आंकलन के अनुसार बेशकीमती जमीनों के एवज में जो सौगात मिली वह ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। पिछले पंद्रह सालों में बिजनेस माइंड लीडर ने अपनी कार्यशैली से यह साबित कर दिया कि सबका साथ सबका विकास भाजपा के लिए केवल जनमानस को सेट करने के लिए जुवानी स्लोगन के अलावा कुछ नहीं है।

बिल्डर्स पर मेहरबानी दिखाने वाले विकास पुरुष पर विपक्षी राजनैतिक दलों के नेतागण आरोप प्रत्यारोप लगाते रहे पर उसका कोई पाजीटिव असर देखने को नहीं मिला।.


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