MP : अब कोरोना के बाद जा रही आंखों की रोशनी, वक्त पर उपचार कराने की जरुरत

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इंदौर । कोरोना संक्रमण का दुष्परिणाम आंखों पर भी पड़ सकता है। कुछ मामले ऐसे भी सामने आए जो बिल्कुल भी नहीं देख पा रहे। इसकी वजह यही है कि कोरोना संक्रमण के दौरान थ्रोम्बोएम्बोलिस्म अर्थात रक्त के थक्के आंखों की नसों में जम जाते हैं और आंखों तक रक्त संचार नहीं हो पाता। इससे 10 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत तक दृष्टि जा सकती है। ऐसा नहीं कि इस समस्या का उपचार संभव नहीं लेकिन जरूरत है वक्त पर उपचार कराने की। जैसे ही आंखों की रोशनी कम हो आप तुरंत नेत्र चिकित्सक से जांच करा लें। यदि चंद घंटों में उपचार मिल जाए तो समस्या दूर हो सकती है। इस दौरान उपचार करा लेने पर दवाई से ही लाभ मिल सकता है, ऑपरेशन की भी जरूरत नहीं पड़ती। बेहतर यही होगा कि कोराना का उपचार पूरी तरह से कराएं और कोरोना के बाद आंखों की जांच जरूर कराएं। यह बात नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉ. प्रणय सिंह ने वेबिनार में कही। क्रिएट स्टोरीज सोशल वेलफेयर सोसायटी द्वारा बुधवार को वेबिनार आयोजित किया गया।

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डॉ. प्रणय सिंह ने बताया कि यह समस्या उन लोगों को ज्यादा होने की आशंका रहती है जो कोरोना का उपचार पूरी तरह से नहीं करवाते। अस्पताल में रहने या घर में ही रहकर उपचार कराने के 14 दिन तक तो दवाई लेते हैं लेकिन उसके बाद दवाई व अन्य नियम ताक पर रख देते हैं। कोरोना से ठीक होने के बाद भी यह बहुत जरूरी है कि कोरोना की दवाई और उपचार जितने दिन जारी रखने का कहा जाए उसका पालन करें। अमूमन दो माह तक की दवाई इसलिए ही दी जाती है ताकि शरीर पर अन्य नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

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कोरोना काल में आंखों को बहुत सहना पड़ रहा है। ब्ल्यू स्क्रीन के सामने रहने से आंखों में थकान और भारीपन महसूस होता है। ब्ल्यू स्क्रीन के सामने अधिक वक्त बिताने के कारण पिछले कुछ सप्ताह में 40 फीसदी से अधिक बच्चों को आंखों से संबंधित समस्या हुई है। अपर्याप्त नींद भी व आंखों की थकान की वजह है। फोकस करने में परेशानी, अत्यधिक आंसू आना या आंखें सूखना, धुंधली दृष्टी या दोहरी दृष्टी, प्रकाश असंवेदनशीलता आदि आंखों की थकान के लक्षण हैं। पहली आंखों की जांच बच्चा जब दो साल का हो तब कराएं क्योंकि कुछ बीमारियां छोटे बच्चों को होती है और वो बता नहीं पाते।

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