MP : जब अपने भगाते है दूर तब ये असली यौद्धा आते है आगे : संक्रमण के डर से सगे तक लाश को छूते नहीं, पैकिंग में भगवान भरोसे पड़ा था भगवानदास का शव

खंडवा .कोविड सेंटर में 13 अप्रैल की रात भगवानदास पिता रामदास चौहान (55) निवासी इंदौर रोड पड़ावा की मौत के पांचवें दिन भी कोई परिजन शव लेने नहीं आया। भगवान भरोसे प्लास्टिक में पैक भगवानदास की लाश पूरी तरह सड़ चुकी थी। ऐसे में शनिवार रात 9 बजे सेवा समिति ने शव को राजा हरिशचंद्र मुक्तिधाम के पास दफनाया।

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कोरोना महामारी से फ्रंटलाइन पर लड़ रहे डॉक्टर, नर्स, वार्डबॉय, पुलिसकर्मियों के साथ ही शहर में कुछ ऐसे मौन सेवाभावी भी हैं, जो पर्दे के पीछे रहकर इस मुश्किल घड़ी में गमगीन लोगों का सहारा बन रहे हैं। सेवा समिति के मुबारिक पटेल, आशिक पंवार और उनकी टीम के सदस्य हेमंत धारू, नवनीत बोयत, शव वाहिनी ड्राइवर सैयद रियासत, बादल बोयत, दिव्यांग रजाक खान व अन्य साथी प्लास्टिक में लिपटी लाशों के बीच खुद की जान दांव पर लगाकर सभी जाति-धर्म के लोगों को श्मशान में दाह संस्कार से लेकर कब्रिस्तान में दफनाने काम कर रहे हैं। जबकि कई मृतकों के परिजन से संक्रमण के डर से लाश के पास छूते तक नहीं। मुबारिक और आशिक कहते है कि विगत 10-15 सालों से अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार व दफनाने का काम कर रहे हैं। कभी सोचा भी नहीं था कि ये दिन देखना पड़ेंगे।

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परिवार की तरह 11 दिन साथ रहे समाजसेवी

सेंधवा के अशोक मोरे (45) का 11 दिन कोविड सेंटर में इलाज चलने के दौरान शनिवार सुबह मौत हो गई। कोरोना प्रोटोकाल के तहत परिजन को शव सौंपा। पत्नी कविता व दो बेटों व रिश्तेदारों की मौजूदगी में मुबारिक पटेल व आशिक पंवार ने उन्हें दफना दिया। परिजन के अनुसार के उनके समाज में दफनाने का रिवाज है। समाजसेवकों ने मोरे परिवार की 11 दिन तक देखभाल की।

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