REWA : मरे को जिंदा बाता कर कराया दुकान का नामांतरण : कलेक्ट्रेट परिसर के सामने दुकान क्रमांक 5 का मामला

रीवा। कलेक्ट्रेट परिसर के सामने नगर निगम द्वारा बनाई गई दुकान के आवंटन में एक दुकान का विवादित होने का मामला सामने आया हैं। कलेक्ट्रेट परिसर के सामने स्थित दुकान क्रमांक 5 जो कि 1992 में रमेश कुमार पुत्र राम प्यारेलाल बहेलिया के नाम दर्ज थी। रमेश कुमार बहेलिया के मृत्यु होने के बाद किराया दार ने फर्जी दस्तावेज बनाकर कर दुकान की बिक्री श्रीमती बीना मिश्रा के नाम करा दी।

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नगर निगम रीवा से मिले दस्तावेजों के मुताबिक 1992 में दुकान नंबर 5 के मालिक रमेश कुमार पुत्र राम प्यारेलाल बहेलिया थें। जिनका 1990 के डिमांड पंजी में दर्ज है। नगर निगम के द्वारा सूचना अधिकार के तहत दिए गए दस्तावेज के मुताबिक 14 मई 1996 को रमेश कुमार बहेलिया द्वारा शपथ से सहमति से दुकान नंबर 5 श्रीमती बीना मिश्रा पत्नी बैजनाथ मिश्रा के नाम नामांतरण किया गया है। उक्त शपथ पत्र को 03 जून 1996 को रत्नेश कुमार द्वारा प्रमाणित किया गया।

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दुकान नामांतरण को लेकर स्व. रमेंश कुमार बहेलिया के पुत्र जीतेन्द्र बहेलिया ने दुकान बिक्री व नामातंरण होने को लेकर कहा कि मेंरे पिता द्वारा दुकान को किराये पर बैजनाथ मिश्रा को दिये थे। बैजनाथ मिश्रा हर माह किराया देते थे। लेकिन पिता की मृत्यु के बाद उन्होने किराया देना बन्द कर दिया। जब हमारे द्वारा बार-बार बिक्री के दस्ताबेज मागे जाते तो कहा जाता हैं कि नगर निगम से ले लो, हम नही देगे। जीतेन्द्र बहेलिया ने कहा कि मेरे पिता ने दुकान नही बेची हैं आप झूठ बोल रहे है, यदि बेची होती तो घर के सभी लोगो बतातें। इतना ही नही नगर निगम से दस्तावेज मागा तो कहा कि पुराने हैं फाइल तलासनी पडेगी। 

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कई वार आवेदन देने के बाद अब जा कर दस्तावेज मिले। दस्तावेजो कि जब जांच की तो उसमें शपथ पत्र ही फर्जी निकला। जीतेन्द्र बहेलिया ने कहा कि मेंरे पिता के मृत्यु 26 मार्च 1995 को हो गई थीं तो शपथ पत्र 14 मई 1996 को कैसे बन गया और 3 जून 1996 को नोटरी ने कैसे प्रमाणित कर दिया।

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जीतेंद्र बहेलिया का कहना हैं कि दुकान को फर्जी तरीके से खरीदी दिखाकर बीना मिश्रा ने अपने नाम नामांतरण करा दिया। इसकी शिकायत पुलिस अधीक्षक, थाना सिविल लाइन, नगर निगम से की है। मांग की हैं कि इस पूरे मामले की जांच कर संबंधित आरोपियो के विरुद्ध कार्यवाही की जाए। कहा कि मेरे पिता द्वारा न तो कभी दुकान बेची गई थी और न ही उन्होंने दुकान की बिक्री करने के बारे में सोचा था। लेकिन किरायेदार के रूप में आए बैजनाथ मिश्रा ने फर्जी तरीके से दस्तावेज बनाकर अपनी पत्नी के नाम नामांतरण लिया।

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